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Sri Vishwakarma Ashtakam 3 – श्री विश्वकर्माष्टकम्

 

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श्रीकरार्चित सत्यशाश्वत लोकनिर्मित निर्जरा
पाकशासनपद्मजादि सुरासुरार्चित भास्करा ।
एकमेव ब्रह्ममूर्ति पिनाकसंस्थित शङ्करा
शोकवर्जित शम्भुनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ १ ॥

सर्वनायक सर्वदायक सर्वसाक्षि महेश्वरा
सर्वराजित सर्वपूजित सर्वकार्य धुरन्धरा ।
सर्वशिक्षक सर्वभक्षक सर्वरक्षक श्रीकरा
सर्वसद्गुण सर्वनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ २ ॥

स्वर्णरूप सुवर्णलोक समस्तकान्ति मनोहरा
वर्णराजित वर्णवर्जित वर्णराज विधाकरा ।
वर्णवाचक वर्णसम्भव वर्णवेदजटाधरा
वर्णवर्णातीत वर्णन विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ ३ ॥

मन्त्रविग्रह मन्त्रसङ्ग्रह मन्त्रमायज संहरा
मन्त्रचेतन मन्त्रनूतन मन्त्रसंशय शेखरा ।
मन्त्रराजित मन्त्रपूजित वेदवेद्य विशारदा
मन्त्रबन्धुर मन्त्रनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ ४ ॥

हारघोर विदारदूर श्रमण निस्वन मञ्जुला
धीरवार्धि गभीरमाया मन्द्रिताश्रित चित्कला ।
सूरित्वष्टृ विहारकल्प विचारकारण सत्फला
मेरु निर्मित मेरुनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ ५ ॥

विश्वचारण विश्वपूरित विश्वधारण निश्चया
विश्वभूषण विश्वतोरण विश्वपोषण विस्मया ।
विश्वतारण विश्वकारण विश्वधारण लीलया
विश्वहारण विश्वनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ ६ ॥

मङ्गलाकर मङ्गलाधर मङ्गलासन पञ्चका
मङ्गलस्थित मङ्गलप्रद मङ्गलाङ्ग विराजिता ।
मङ्गलायत भीषदायक मङ्गलाकर नामका
मङ्गलायज तुङ्गनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ ७ ॥

कल्पपावन कल्पजीवन कल्पभाव नमोस्तु ते
कल्पपालन कल्पखेलन कल्पजाज्ञ नमोस्तु ते ।
कल्पनाकृत कल्पसम्युत कल्पकल्प नमोस्तु ते
कल्पिताण्डज कल्पनामक विश्वकर्म जगत्प्रभो ॥ ८ ॥

इति श्री विश्वकर्माष्टकम् ॥


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